◆सावन सोमवार व्रत का महत्व◆
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| Sawan Somvar Vrat |
आइए जानते है सावन के सोमवार व्रत के बारे वास्तविक जानकारी।
सावन सोमवार व्रत का महत्व तथा शिवजी की विशेष पूजा: हिन्दू मान्यता के अनुसार सावन महीने को शिवजी का प्रिय माना गया है माना जाता है कि इस दिन व्रत रखने और भगवान शिव की अराधना से विशेष लाभ प्राप्त होता है। ... क्योंकि इस पूरे महीने भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है। सावन का महीना भगवान शिव का पसंदीदा माना गया है जिस कारण इस महीने में आने वाले सोमवार का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि सोमवार का दिन भगवान भोलेनाथ को समर्पित है।
हर सोमवार को शिवजी की पूजा की जाती है पर सावन के महीने में सोमवार को शिवजी की पूजा करना उत्तम माना जाता है सावन महीने में शिवजी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है तथा सयोंग से इस साल यह महीना (सोमवार) 6 जुलाई 2020 से शुरू होकर (सोमवार) 3 अगस्त 2020 को समाप्त होगा।
- सावन के सोमवार के व्रत क्यों किये जाते है?
- क्या शिवलिंग की पूजा और जलाभिषेक करने से मोक्ष सम्भव है??
- व्रत करना गीता अनुसार कैसा है? तथा इससे मोक्ष सम्भव है?
- क्या तीन देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की भक्ति करने मोक्ष सम्भव है?
सावन के सोमवार के व्रत क्यों किये जाते है?
माता पार्वती ने सावन के महीने में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी ।
जब सती पार्वती जी ने इस महीने शिवलिंग पूजा, उनकी आराधना की फिर उनकी कामना पूर्ण हुई। माना जाता है कि पार्वती जी की कठोर तपस्या से प्रसन्न शिवजी जी भगवान को सावन का महीना सबसे प्रिय है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन महीने में आने वाले सोमवार को भगवान शिव की पूजा अर्चना करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। इस महीने में लोग सुखी विवाहित जीवन की कामना के लिए व्रत रखते हैं। इसके साथ ही महिलाएं अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए भी इस महीने व्रत रखती हैं।
भगवान शिव की पूजा के लिए और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से सावन सोमवार व्रत रखे जाते हैं।पौराणिक मान्यता के अनुसार श्रावण महीने के सोमवार व्रत, जो व्यक्ति करता है उसकी सभी इछाएं पूर्ण होती है। इन दिनों किया गया दान पूण्य एवं पूजन समस्त ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान फल देने वाला होता है। इस व्रत का पालन कई उद्देश्यों से किया जा सकता है।
वैवाहिक जीवन की लम्बी आयु और संतान की सुख-समृद्धि लिये या मनचाहा वर की प्राप्ति करती है। माना जाता है सावन सोमवार व्रत कुल वृद्धि, लक्ष्मी प्राप्ति और सुख -सम्मान देने वाले होते हैं।
क्या शिवलिंग की पूजा और जलाभिषेक करने से मोक्ष सम्भव है??
सावन महीने में मुख्य रूप से शिव लिंग की पूजा होती है
इन दिनों में भगवान शिव की पूजा जब बेलपत्र से की जाती है, तो भगवान अपने भक्त की कामना जल्द से पूरी करते है। बिल्व पत्थर की जड में भगवान शिव का वास माना गया है।
माता पार्वती ने सावन के महीने में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी ।
वह शिवलिंग बना कर उसकी पूजा आराधना करती थी इसी कारण इस महीने में शिवजी के भक्त शिवलिंग की पूजा अर्चना करते है। शिव पुराण की इस कथा से प्रेरित होकर शिवभक्त शिवलिंग की पूजा करना बहुत शुभ और मनोकामना पूर्ण होने वाली मानते है जब सती पार्वती जी ने इस महीने शिवलिंग पूजा, उनकी आराधना की फिर उनकी कामना पूर्ण हुई, तो भगवान शिव हमारी कामना भी अवश्य पूर्ण करेंगे ।
पौराणिक कथा है कि शिवजी को जल से शीतलता मिली थी। जब शिव जी विष को धारण कर रहे थे उस समय माता पार्वती ने उनके गले को दबाए रखा, माता पार्वती को डर लग रहा था कि विष शरीर के अंदर न चला जाये । जिससे विष का प्रभाव केवल गले में हुआ और शेष शरीर पर इसका प्रभाव से नही हुआ। विष के प्रभाव से शिवजी का कण्ठ नीला हो गया। इसलिए इन्हें "नीलकण्ठ" कहा जाता है विष के प्रभाव से शिवजी को असहनीय गर्मी को सहन करना पड़ा। कैलाश पति को विष की गर्मी से छुटकारा दिलवाने के लिए इंद्र ने वर्षा करवाई थी। शिवजी ने सावन के महीने में ही विषपान किया था। इस कथा से प्रेरित भक्त इस महीने में शिवजी को जल चढ़ाते है । यह मान्यता है कि शिवजी को जल चढ़ाने से शिवजी बहुत खुश होते है । लोगों का कहना है उनकी हर मनोकामना पूर्ण होती है ।
व्रत करना गीता अनुसार कैसा है ? तथा क्या इससे मोक्ष सम्भव है ?
श्रीमद्भगवत् गीता अध्याय 6 श्लोक 16 में मना किया है कि हे अर्जुन ! यह योग ( भक्ति ) न तो अधिक खाने वाले का और न ही बिल्कुल न खाने वाले का अर्थात् यह भक्ति न ही व्रत रखने वाले , न अधिक सोने वाले की तथा न अधिक जागने वाले की सफल होती है।इस श्लोक में व्रत रखना पूर्ण रुप से मना है।
अर्थात् गीताजी के अनुसार व्रत करना व्यर्थ है। यह एक शास्त्र विरुद्ध साधना है जिसके कारण व्रत करने से मोक्ष सम्भव नही है।
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| Gita Saar |
क्या तीन देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की भक्ति करने मोक्ष सम्भव है?
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| Brahma, Vishnu, Mahesh |
आज तक हिन्दू समाज में तीनों देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) को अजर - अमर बताया गया।
परन्तु हमारे शास्त्र प्रमाणित करते है कि इनकी जन्म- मृत्यु होती है।
ब्रह्मा विष्णु महेश अजर-अमर नहीं है।
पवित्र देवी भागवत महापुराण ( तृतीय स्कंध पेज नंबर 123) पर प्रमाणित है, कि ब्रह्मा विष्णु महेश की जन्म मृत्यु हुआ करती है, तथा यह स्वयं स्वीकार करते हैं कि हमारा तो आविर्भाव अर्थात जन्म, तिरोभाव अर्थात मृत्यु हुआ करती है।
श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 8 के श्लोक 16 व अध्याय 9 का श्लोक 7 में बताया है कि ब्रह्म लोक से लेकर ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी आदि के लोक और ये स्वयं भी जन्म मरण व प्रलय में है । इसलिए ये अविनाशी नहीं हैं । जब ये अविनाशी नहीं है तो इनके उपासक भी जन्म मरण में ही हैं ।
देवी देवताओं व तीनों गुणों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की पूजा करना तथा भूत पूजा, पितर पूजा, यह सब व्यर्थ की साधना है इन्हें करने वालों को घोर नरक में जाना पड़ेगा । अध्याय 7 का श्लोक 12 से 15 तथा 20 से 23 व अध्याय 9 के श्लोक 25 में यह प्रमाण है ।
गीताजी अनुसार जो साधक तीनो गुणों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) तक कि साधना से मिलने वाले लाभ पर ही आश्रित है वे राक्षस स्वभाव को धारण किये हुए मनुष्यों में नीच, शास्त्र विरुद्ध भक्ति करने वाले मूर्ख मुझ ब्रह्म की भी पूजा नही करते है (गीता अध्याय 7 श्लोक 15)
सभी प्रमाणों से सिद्ध होता है कि इस तीन देवताओं की भक्ति करना शास्त्र विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करना है तथा यह अविनाशी भगवान नही है इनकी भी जन्म- मृत्यु होती है। तो इनके उपासकों का मोक्ष सम्भव नही है।
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| Brahma, Vishnu, Mahesh |
तीन देव की जो करते भक्ति।
उनकी कबहु न होवै मुक्ति।।
मूर्ति पूजा एक आन- उपासना है।
इस मास में जो भी पूजा साधना की जा रही है वह बिल्कुल भी शास्त्र अनुकूल भक्ति विधि नहीं है। शास्त्रों के अनुसार भक्ति विधि केवल तत्वदर्शी संत ही बता सकते है ।
प्रमाण है गीता जी का अध्याय 15 के श्लोक 1 से 4 व 16 , 17 में ।
जो शास्त्र अनुकूल यज्ञ हवन आदि पूर्ण गुरु के माध्यम से नहीं करते उन्हे लाभ नहीं होता। अध्याय 3 के श्लोक 12 में प्रमाण है
श्रीमद्भागवत गीता अध्याय 16 के श्लोक 23 - 24 में प्रमाण है। जो शास्त्रों विधि को त्याग कर मनमाना आचरण करते है न तो उनको लाभ होता है, न उनको कोई सिद्धि प्राप्त होती है तथा न उनकी गति(मोक्ष) होता है अर्थात् व्यर्थ है।
शास्त्रों अनुसार भक्ति विधि सिर्फ तत्वदर्शी संत बताते है तथा जो भी धार्मिक क्रिया करते है वो पूर्ण गुरु के बिना सफल नही हो सकती है तथा पूर्ण गुरु सभी शास्त्रों का जानकार होता है तथा शास्त्रों अनुसार भक्ति विधि बताता है।
इस महीने जो भी धार्मिक क्रिया हिन्दू समाज द्वारा की जाती है वो शास्त्रों के विरुद्ध है तथा उसको करना व्यर्थ है।
वर्तमान में तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज है जो शास्त्रो अनुसार भक्ति विधि बताते है जिससे साधक को सभी लाभ प्राप्त होते है तथा पूर्ण मोक्ष की 100% गारंटी है
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