परमात्मा ने हमें मनुष्य ही क्यों बनाया है ?
मानव जीवन परमात्मा की शास्त्राविधि अनुसार साधना करके मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्राप्त होता है।
84 लाख योनियां भुगतने के बाद एक मानव शरीर प्राप्त होता है। प्राणी की जीवन की यात्रा जन्म से प्रारम्भ हो जाती है। उसकी मंजिल निर्धारित होती है। मानव (स्त्री/पुरूष) की मंजिल मोक्ष प्राप्ति है।
मानव शरीर मे ही पूर्ण मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। गीता में भी मानव शरीर को मोक्ष का द्वार कहा गया है।
जो मानव शरीर प्राप्त प्राणी भक्ति नही करते है वे अपना मानव जीवन व्यर्थ कर रहे है
मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारं-बार।
तरुवर से पत्ता टूट गिरे, बहुर ना लगता डार।।
भावार्थ :- कबीर परमात्मा जी ने समझाया है कि हे मानव शरीरधारी प्राणी! यह मानव जन्म (स्त्री/पुरूष) बहुत कठिनता से युगों पर्यन्त प्राप्त होता है।
यह बार-बार नहीं मिलता। इस शरीर के रहते-रहते शुभ कर्म तथा परमात्मा की भक्ति कर, अन्यथा यह शरीर समाप्त हो गया तो आप पुनः इसी स्थिति यानि मानव शरीर को प्राप्त नहीं कर पाओगे। जैसे वृक्ष से पत्ता टूटने के पश्चात् उसी डाल पर पुनः नहीं लगता।
इसलिए इस मानव शरीर के अवसर को व्यर्थ न गँवा।
कबीर जी ने फिर कहा है कि :-
कबीर, मानुष जन्म पाय कर, नहीं रटैं हरि नाम।
जैसे कुंआ जल बिना, बनवाया क्या काम।।
भावार्थ :- मानव जीवन में यदि भक्ति नहीं करता तो वह जीवन ऐसा है जैसे सुंदर कुंआ बना रखा है। यदि उसमें जल नहीं है या जल है तो खारा (पीने योग्य नहीं) है, उसका भी नाम भले ही कुंआ है, परंतु गुण कुंए (Well) वाले नहीं हैं। इसी प्रकार मनुष्य भक्ति नहीं करता तो उसको भी मानव कहते हैं, परंतु मनुष्य वाले गुण नहीं हैं।
भक्ति तथा धर्म के बिना मानव जीवन नरक बन जाता है
पूर्व जन्मों में किए शुभ-अशुभ कर्मों तथा भक्ति के कारण कोई स्वस्थ है। वह अचानक रोगी हो जाता है और लाखों रूपये उपचार पर खर्च करके मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। कोई जन्म से रोगी होता है, आजीवन कष्ट भोगकर मर जाता है। कोई निर्धन होता है, कोई धनवान ही जन्मता है। किसी के लड़के-लड़की होते हैं तो किसी को संतान प्राप्त ही नहीं होती। किसी को पुत्री-पुत्री ही संतान होती है, चाहने पर भी पुत्र नहीं होता। यह सब पूर्व जन्मों के कर्मों का फल मानव भोगता है। जब तक पुनः भक्ति प्रारम्भ नहीं करता तो तब तक पूर्व वाले संस्कार ही प्राणी को प्राप्त होते हैं। जिस समय पूर्ण सतगुरू से दीक्षा लेकर मर्यादा से भक्ति करने लगता है तो शुभ संस्कारों में वृद्धि होने से दुःख का वक्त सुख में बदलने लग जाता है।मानव शरीर में जो भी प्राप्त हो रहा है, वह पूर्व के जन्मों का संग्रह है। यदि वर्तमान में शुभ कर्म तथा भक्ति नहीं की तो भविष्य का जीवन नरक हो जाएगा।
मानव जीवन प्राप्त प्राणी को चाहिए कि सांसारिक कर्तव्य कर्म करते-करते आत्म कल्याण का
कार्य भी करे। जिस कारण से परिवार से आने वाली पूर्व पाप की मार भी टलेगी, परिवार खुशहाल रहेगा। अन्यथा शुभ-अशुभ दोनों कर्मों का फल भोगने से कभी सुख तथा कभी दुःख का कहर भी झेलना पड़ता है।
मानव शरीर रूपी वस्त्र अनमोल हैं। तत्वज्ञान के अभाव से भक्ति न करके पाप पर पाप करके इस पर दाग लगा रहा है। इस संसार में जीवन अधिक नहीं है। अपने परिवार के पोषण में तथा धन संग्रह करने में जो परेशानी उठा रहा है।
पाप करके धन जोड़ रहा है। मृत्यु के पश्चात् परिवार तथा संपत्ति धन बेगानी हो जाएगी। इसे जोड़ने में किए पाप तुझे नरक में जलाऐंगे।
कबीर परमेश्वर जी ने फिर बताया है कि :-
बिन उपदेश अचम्भ है, क्यों जिवत हैं प्राण।
भक्ति बिना कहाँ ठौर है, ये नर नाहीं पाषाण।।
भावार्थ :- परमात्मा कबीर जी कह रहे हैं कि हे भोले मानव! मुझे आश्चर्य कि बिना गुरू से दीक्षा लिए किस आशा को लेकर जीवित है। न तो शरीर तेरा है, यह भी त्यागकर जाएगा। फिर सम्पत्ति आपकी कैसे है?
कबीर, काया तेरी है नहीं, माया कहाँ से होय।
भक्ति कर दिल पाक से, जीवन है दिन दोय।।
मानव शरीर प्राप्त प्राणी को पूर्ण संत से दीक्षा लेकर मर्यादा में रहकर आजीवन भक्ति करनी चाहिए ।
देवता भी इस मानव जीवन के लिए तरसते है। क्योंकि पूर्ण मोक्ष सिर्फ मानव शरीर मे ही प्राप्त कर सकते है।
वर्तमान समय मे धरती पर पूर्ण सन्त के आये हुए है ये समय बहुत ही अनमोल है
एक समय मे एक ही पूर्ण सन्त होते है इस समय सो पूर्ण सन्त जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज है जो शास्त्रानुसार भक्ति देते है इस भक्ति को करने से मानव परमात्मा की प्राप्ति कर सकता है तथा पूर्णमोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
अधिक जानकारी के लिए देखिये साधना चैंनल शाम 7:30 बजे से 8:30 बजे रोजाना संत रामपाल जी महाराज के मंगल प्रवचन अवश्य सुने।
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